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मंगलवार, 31 जनवरी 2012

राष्ट्रपिता को शहीदी दिवस पर 'सूखे' श्रद्धा सुमन

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को उनके शहीदी दिवस (30 जनवरी) पर जिला व कुमाऊं मंडल मुख्यालय नैनीताल में कैसे याद किया गया, यह चित्र इसकी बानगी हैं। यहाँ तल्लीताल डांठ पर स्थापित गांधीजी की आदमकद मूर्ति पर आज नए फूल चढ़ाने तो दूर गत 26 जनवरी से चढ़ाये गए सूखे फूलों को भी नहीं हटाया गया। मुख्यालय में आज शायद रविवार होने कि वजह से परंपरागत तौर पर ऐसे मौके पर सुबह 11 बजे बजने वाला साइरन बजाना भी प्रशासन भूल गया। गांधीजी के नाम पर राजनीतिक रोटियां सेंकने वाले राजनीतिक दलों के बात-बात पर आसमान सर पर उठाने वाले कार्यकर्ताओं ने भी कहीं कोई सार्वजनिक आयोजन नहीं किया। हाँ, गत 26 जनवरी से ही उनकी मूर्ति के नीचे अपनी मांगों पर सत्याग्रह कर रहे कुमाऊं विश्व विद्यालय के एक सेवानिवृत्त कर्मी ने जरूर आज इस मौके पर अपना आन्दोलन स्थगित रखकर अपनी ओर से 'श्रद्धा सुमन' अर्पित किये। सनद रहे, इसलिए नीचे इस आशय का पोस्टर भी चिपका दिया। 
उल्लेखनीय है कि अपने कुमाऊँ प्रवास के दौरान गांधी जी 14 जून 1929 को इसी स्थान पर आये थे। तब नगर वासियों ने गांधीजी को उनके हरिजन उद्धार कार्यक्रम के लिए इस कदर दिल खोलकर दान दिया था कि गांधीजी अभिभूत हो उठे थे, और इसे जीवन भर याद रखने कि बात कही थी। इधर आज भी यदि गांधीजी की आत्मा यदि कहीं आसपास होगी तो निश्चित ही उन्होंने अपनी मूर्ति की आँखें झुका ली होंगी। 

उल्लेखनीय है की महात्मा गाँधी को तब तत्कालीन गवर्नर मेल्कम हेली ने राज्य अतिथि घोषित किया था, और उनके आतिथ्य व ठहरने का प्रबंध राजभवन में किया गया था, बावजूद वह राजभवन के बजाये निकटवर्ती ताकुला गाँव में गोविन्द लाल साह के घर रुके थे. तभी से इस गाँव को आधिकारिक रूप से 'गांधी ग्राम ताकुला' कहा जाने लगा, लेकिन यह विडम्बना ही कही जायेगी कि वहां भी कभी गांधी जयंती या उनके शहीद दिवस को कोई कार्यक्रम नहीं होते.


यह लेख मूलतः 30 जनवरी २०११ में लिखा गया था, लेकिन इस वर्ष भी हालातों में कोई सुधर या परिवर्तन देखने को नहीं मिला...

मंगलवार, 24 जनवरी 2012

प्रत्याशी ही नहीं समर्थकों की छवि पर भी मतदाताओं की नजर


शैक्षिक स्तर व जागरूकता बढ़ने का भी है असर, आंख-मूंदकर नहीं कर रहे किसी का समर्थन या विरोध
नवीन जोशी, नैनीताल। उत्तराखंड के मतदाताओं में अब वोट को लेकर जागरूकता आ गई है। मतदाता न सिर्फ उम्मीदवार की छवि को आधार बना रहे हैं, बल्कि उनके प्रमुख समर्थकों पर भी नजरें गड़ाएं हैं। छवि बनाने में भी एक पक्षीय निर्णय नहीं लिया जा रहा, वरन तर्क की कसौटी पर भी छवियों को कसने की कोशिश की जा रही है। प्रदेश के मतदाताओं में बढ़े साक्षरता के स्तर को इसका प्रमुख कारण माना जा रहा है।
 इस चुनाव में राज्य की जनता प्रचार के लिए पहुंच रहे उम्मीदवारों से कई सवाल कर रही है। लोग नेताओं से स्थानीय समस्याओं का समाधान पूछ रहे हैं और नेताओं द्वारा किए जा रहे वादों की हकीकत पूछ रहे हैं। यह पहली बार हुआ है कि लोग महज नेताजी का भाषण ही नहीं सुन रहे, उनसे सवाल कर विकास कार्यों का हिसाब भी मांग रहे हैं। जनता अपने विधायक से चाहती है कि वह अपने क्षेत्र से भली-भांति वाकिफ हो, वह विपक्ष में होने जैसे विषम राजनीतिक हालातों में भी स्वयं को स्थापित कर मजबूती से जनता की समस्याओं को विधायिका में रखने में समर्थ हो। विस क्षेत्र और प्रदेश की जनता कमोबेश ऐसी ही कसौटी पर अपने विधायक प्रत्याशियों को कस रही है। ऐसे में यदि किसी प्रत्याशी के समर्थक उनसे अपने पक्ष में मतदान करने को कहते हैं तो कई बार वह प्रत्याशी को लेकर ऐसे सवालात भी कर रहे हैं। यह मतदाताओं के जागरूक होने का संकेत माना जा सकता है। जातीय-क्षेत्रीय आधार पर बात करने वाले समर्थकों को कई बार मतदाता सीधे ‘ना’ कहने से भी गुरेज नहीं कर रहे। प्रत्याशियों के साथ ही उनके समर्थकों की छवि भी देखी जा रही है। ‘अभी से प्रत्याशी ऐसे समर्थकों से घिरा है तो आगे जीतने पर क्या करेगा’ ऐसी चिरौरियां भी पीठ पीछे की जा रही हैं और कई बार इसके उलट अच्छी छवि के समर्थकों पर विश्वास भी जताया जा रहा है कि ऐसे लोग साथ हैं तो आगे भी प्रत्याशी ठीक कार्य ही करेगा। 

महिलाएं निभा रहीं प्रचार में प्रमुख भूमिका
नैनीताल। हालिया दौर में महिलाओं के घर की चौखट से कार्य के लिए बाहर निकलने का असर चुनाव प्रचार पर भी दिख रहा है। पुरुष मतदाता अपने समर्थक प्रत्याशी के खुले समर्थन में आकर अन्य से नाराजगी मोल नहीं लेना चाहते और चुनाव प्रचार से दूर ही रहते हैं। वहीं निम्न- मध्यम के साथ ही उच्च-मध्यम वर्ग की महिलाएं आजादी का लुत्फ चुनाव प्रचार में अपनी बढ़-चढ़कर भागेदारी निभाकर ले रही हैं। घर-घर चल रहे प्रचार- कैंपेनिंग में महिलाओं का उपयोग प्रत्याशियों को भी सहज एवं प्रभावी लग रहा है। मतदाता भी उनकी बात अधिक सहजता से सुन रहे हैं।

सोमवार, 23 जनवरी 2012

भाजपा का अगला कार्यकाल पहाड़ को होगा समर्पित : बचदा


पीपीपी मोड में 50 हजार करोड़ रुपये के निवेश से पहाड़ में उद्योग व किसानों को सस्ते लोन देने का वादा
जल, जंगल, जमीन के मुद्दे पर पार्टी को बेहद सचेत बताया
नैनीताल (एसएनबी)। भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं चुनाव घोषणा पत्र समिति के संयोजक बची सिंह रावत ‘बचदा’ ने कहा कि वर्तमान कार्यकाल में भाजपा ने मैदानी क्षेत्रों में विकास की गंगा बहाई है जबकि अगला कार्यकाल पर्वतीय क्षेत्रों के विकास के नाम रहेगा। पार्टी के चुनाव घोषणा पत्र का हवाला देते हुए उन्होंने पीपीपी मोड में पहाड़ पर 50 हजार करोड़ रुपये का निवेश करवाने, औद्योगिक विकास करने, लघु एवं सीमांत किसानों को महज दो फीसद ब्याज पर कृषि ऋ ण देने तथा चार लाख हेक्टेयर बेनाप रक्षित वन भूमि का प्रबंधन कर विकास कायरे को गति देने एवं भूमिहीनों को भूमि देने तथा फलों के बीमा की योजना लाने जैसे कई वायदे किये हैं। सोमवार को नगर के पत्रकारों से वार्ता में बचदा ने कहा कि भाजपा उत्तराखंड की अवधारणा से जुड़े मुद्दों के प्रति खासी सचेत है। खेती, किसान और भूमि भाजपा के चुनाव घोषणा पत्र में प्रमुख मुद्दे हैं। वर्ग चार जैसी भूमि पर दशकों से काबिज लोगों को स्वामित्व परिवर्तन के अधिकार दिये जाएंगे। सरकार ने 1893 के अंग्रेजों के जमाने के कानून को समाप्त कर करीब चार लाख हेक्टेयर बेनाप रक्षित भूमि को मुक्त कराया है, अब अगले कार्यकाल में इसका प्रबंधन करेंगे। इस मौके पर पार्टी जिलाध्यक्ष भुवन हरबोला, विस संयोजक बालम मेहरा, जिला मंत्री विवेक साह, मनोज साह, मनोज जोशी, हिमांशु जोशी आदि भी मौजूद थे। 

निशंक का बचाव किया 
नैनीताल। भाजपा के वरिष्ठ नेता बची सिंह रावत ने टीम अन्ना के सदस्य अरविंद केजरीवाल द्वारा पूर्व सीएम डा. निशंक पर की गई टिप्पणी पर पार्टी के पूरी मजबूती से उनके साथ होने की बात कही। उन्होंने कहा कि निशंक उतने ही पाक-साफ हैं, जितना कोई और। उन्होंने कहा कि कायरे में अनियमितता हो सकती है पर भ्रष्टाचार का सवाल ही नहीं है। उन पर आरोप लगाने वालों को पहले शिकायत दर्ज करनी चाहिए।
मूलतः यहाँ क्लिक करके देखें ।

नैनीताल में कांग्रेस पर 21 वर्ष का बनवास तोड़ने की चुनौती

मंडल मुख्यालय की महत्वपूर्ण सीट पर भाजपा-कांग्रेस में सीधी टक्कर के आसार  
नवीन जोशी, नैनीताल। कुमाऊं की नैनीताल सुरक्षित सीट पर भाजपा के हेम आर्य और कांग्रेस की सरिता आर्य के बीच सीधी टक्कर के आसार हैं जबकि बसपा त्रिकोण बनाने की कोशिश में है। वि प्रसिद्ध पर्यटन नगरी की इस सीट पर कांग्रेस को 21 वर्ष के वनवास को तोड़ने की तथा भाजपा के समक्ष अपनी मौजूदा सीट को प्रत्याशी बदलने के बाद भी बरकरार रखने की चुनौती है। मंडल मुख्यालय होने के नाते नैनीताल सीट पर देश-प्रदेश की नजर रहती है, इस लिहाज से यह सीट प्रदेश की महत्वपूर्ण सीटों में शुमार है। देश-दुनिया के सैलानी यहां तनाव-समस्याओं का बोझ उतारने के लिए आते हैं, तो खासकर सीजन में नगरवासियों को सैलानियों की अधिक संख्या का दंश झेलना पड़ता है। सैलानियों के वाहनों के बीच नगरवासियों के पैदल निकलने तक को जगह नहीं मिलती और उनके हिस्से की पेयजल आपूर्ति भी सैलानियों के लिए होटलों को कर दी जाती है। पर्यटन से अधिक लाभ कमाने वाले होटलों पर किसी का नियंत्रण नहीं है, उनकी दरें तक तय नहीं जबकि नाव, रिक्शे, घोड़े व टैक्सी वालों की दरें तय कर शिंकजा कसा हुआ है। निकटवर्ती ग्रामीण क्षेत्रों में ‘दीपक तले अंधेरा’ जैसी स्थिति है, उनकी बिजली, गैस जैसी सुविधाएं शहर हड़प जाता है तो बिना शुद्ध पानी के लिए सूखे प्राकृतिक जल स्रेतों पर ही निर्भरता रहती है। इधर हालिया परिसीमन में नैनीताल सीट अनुसूचित कोटे में चली गई है, साथ ही परिसीमन से यहां का भूगोल बदल गया है। एक हिस्सा कटकर कालाढूंगी में चला गया है जबकि खत्म हुई मुक्तेर का बेतालघाट-कोश्यां कुटौली का हिस्सा इस सीट में जुड़ गया है। कालाढूंगी से भाजपा ने पिछले विस चुनावों में भाजपा के खड़क सिंह बोहरा की तथा बेतालघाट ने कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष यशपाल आर्य को विस पहुंचाने में प्रमुख भूमिका निभाई थी। इधर नगर क्षेत्र में उक्रांद के पूर्व विधायक डा. नारायण सिंह जंतवाल बीते दो चुनावों में बढ़त हासिल करते रहे। अब जबकि जंतवाल मैदान में नहीं हैं, ऐसे में उक्रांद के वोटरों के समक्ष भाजपा व कांग्रेस में से एक को चुनने का असमंजस है। नैनीताल सीट में 50,297 पुरुष व 44,063 महिला मतदाता हैं जिनमें क्षेत्रीय आधार पर नैनीताल नगर क्षेत्र में करीब 29,052, भवाली में करीब साढ़े 15 हजार, बेतालघाट क्षेत्र में 14 हजार, गरमपानी क्षेत्र में 21 हजार, खुर्पाताल में तीन हजार तथा कोटाबाग के पर्वतीय क्षेत्रों में करीब आठ हजार मतदाता निवास करते हैं, इनमें सर्वाधिक 37 हजार के करीब क्षत्रिय, 28 हजार ब्राह्मण, 18 हजार अनुसूचित जाति, 11 हजार मुस्लिम तथा करीब एक हजार सिख व अन्य अल्पसंख्यक वर्ग के मतदाता हैं। 1986 में चुनाव जीते किशन सिंह तड़ागी इस सीट से आखिरी कांग्रेसी विधायक रहे। 91 की रामलहर से लगातार तीन चुनाव भाजपा के बंशीधर भगत यहां से चुनाव जीते। 2002 में उक्रांद प्रत्याशी डा. नारायण सिंह जंतवाल ने भाजपा से यह सीट झटक ली। गत 2007 के विस चुनावों में भाजपा के खड़क सिंह बोहरा ने पुन: यह सीट हासिल कर भाजपा का एक बार पुन: नैनीताल से परचम फहराया। एंटी इनकम्बेंसी की बात करें तो नैनीताल विस के पुराने हिस्से में क्षेत्रीय भाजपा विधायक बोहरा को लेकर तथा मुक्तेर के हिस्से में वहां के सिटिंग विधायक कांग्रेस अध्यक्ष यशपाल आर्य के खिलाफ मतदाताओं में एक हद तक नाराजगी दिखती है। पर्यटन नगरी होने के कारण नगर क्षेत्र में जहां आम लोग खासकर सीजन के दिनों में पर्यटकों के भारी संख्या में आने के कारण परेशानी महसूस करते हैं, व नगर की सड़कों- चौराहों के चौड़ीकरण, पार्किग स्थलों के विकास, नगर में साफ-सफाई, जिला अस्पताल में बेहतर सुविधाएं व डॉक्टरों की तैनाती जैसी प्रमुख आवश्यकता मानते हैं, और पर्यटन व्यवसायी नगर को बेहतर ‘कनेक्टिविटी’, मनोरंजन के लिए सिनेमा हॉल न होने जैसी समस्याएं गिनाते हैं। वहीं ग्रामीण क्षेत्र के लोग चाहते हैं कि उन्हें भी ग्रामीण पर्यटन के जरिये पर्यटन नगरी के करीब होने का लाभ मिले। मुख्यालय आने- जाने को यातायात की सस्ती सुविधाएं सुलभ कराई जाएं। गांव व शहर के बीच की चौड़ी खाई को पाटने की भी ग्रामीण आवश्यकता जताते हैं। बहरहाल, नगर में चुनाव प्रत्याशी की छवि को लेकर तथा ग्रामीण क्षेत्रों में किये गये कायरे और भविष्य में उससे कार्य कराये जा सकने की संभावनाओं पर निर्भर हो चला है। बसपा के संजय कुमार भी मुकाबले को तीसरा कोण देने की कोशिश में हैं, जबकि उक्रांद-पी से विनोद कुमार, सपा से देवानंद व निर्दलीय पद्मा देवी भी मैदान में हैं।
इस आलेख को इस लिंक पर क्लिक करके मूलतः देखा जा सकता है 

शनिवार, 21 जनवरी 2012

प्रत्याशी आजमा रहे ‘माउथ पब्लिसिटी’ का फंडा

मोहल्लों-पड़ावों  के दुकानदारों को मिल रहीं प्रत्याशी की बढ़त बताने को गड्डियां                     


नवीन जोशी,  नैनीताल। राम सिंह जी की कालाढूंगी रोड पर एक दुकान है। एक प्रत्याशी उन्हें गड्डी पकड़ा गया है। बोल कर गया है कि वह चाहे उसे वोट दे या न दे, लेकिन उसे दुकान पर आने वाले ग्राहकों के पूछने या चर्चा करने पर कहना है कि वह (गड्डी देने वाला प्रत्याशी) जीत रहा है। राम सिंह जितना पूरे दिन में नहीं कमा पाते, केवल बातें करने के कमा रहे हैं। क्षेत्र में ‘माउथ पब्लिसिटी’ का यह नया फंडा खूब चल रहा है। चुनाव में प्रत्याशी अपनी जीत के लिए हर तरह का हथकंडा अपनाते हैं। प्रबंध गुरु कहते हैं कि किसी भी वस्तु या सेवा की मांग बढ़ाने में ‘माउथ पब्लिसिटी’ सबसे कारगर हथियार साबित होती है। आप नई गाड़ी खरीदने जा रहे हैं, लेकिन आपको गाड़ी के बारे में कोई जानकारी नहीं है, तो किसी न किसी से जरूर पूछेंगे कि कौन सी गाड़ी बेहतर होगी। पहले दो-तीन लोगों ने आपको जो गाड़ी बेहतर बता दी, वह आपके मन मस्तिष्क में बैठ जाएगी और उसे आप खरीद लाएंगे। ऐसे ही यह भी हो सकता है कि किसी गाड़ी के बारे में बुरी ‘फीड बैक’ आये और आप चाहते हुए भी उसे न लें। हमारा देश भावना प्रधान लोगों का देश है, और खासकर राजनीति में भावनाओं के आधार पर ही प्रत्याशियों व पार्टियों की अच्छी-बुरी छवि बना करती है। दो दशक पूर्व गणोश जी के दूध पीने और अभी हाल में लखनऊ में सोते ही बुत में तब्दील होने जैसी अफवाहें माउथ पब्लिसिटी के कारण ही इतनी अधिक चर्चा में रहीं। इसी फंडे पर क्षेत्र की एक पार्टी भी अमल कर रही है। उसके प्रत्याशी पूर्व में भी इस फंडे को आजमा चुके हैं। अब उनकी पार्टी इस चुनाव में भी इस फंडे को आजमा रही है, और बताया जा रहा है कि इस फंडे पर बीते कुछ दिनों में उनकी पार्टी ने ठीक-ठाक बढ़त भी बना ली है। आगे देखने वाली बात यह होगी कि माउथ पब्लिसिटी का यह फंडा यहां के चुनाव परिणामों को किस तरह प्रभावित करता है।
जिसकी पी दारू उसकी बताई हवा
नैनीताल। बाहर से देखने में इस बार के विस चुनाव भले चुनाव आचार संहिता के भय से जितने साफ- सुथरे चल रहे हों, परंतु ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसा नहीं है। वहां कच्ची-पक्की दारू खूब बंट रही है, साथ ही बाहर से मुग्रे ले जाने में आयोग की नजर पड़ने के भय से ग्रामीण क्षेत्रों में ही पलने वाले बकरों का मतदाताओं को भोग लगाया जा रहा है। "क्या है रुझान" पूछने पर मतदाता पहले सामने वाले को भांपता है, और फिर उसी के पक्ष में ‘हवा’ होने की बात कहने लगता है।


मजदूर संभाल रहे चुनाव प्रचार की बागडोर
नाम वापसी से अब तक कुमाऊं में 50 करोड़ का कारोबार प्रभावित
गौरव पाण्डेय, हल्द्वानी। चुनावी सरगर्मी के बीच बाजार से मजदूर गायब हो गये हैं। इसके चलते कई कारोबारी गतिविधियां ठप हो गई हैं। नाम वापसी से अब तक कुमाऊं में इससे 50 करोड़ से अधिक का कारोबार प्रभावित होने का अनुमान है। यह स्थिति मतदान के कुछ दिन बाद तक बनी रह सकती है। दरअसल मजदूर प्रत्याशियों के चुनावी अभियान की बागडोर संभाले हुए हैं। एक अनुमान के मुताबिक कुमाऊं में करीब चार लाख मजदूर हैं। इनमें उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, दिल्ली आदि के साथ ही नेपाली मजदूर भी शामिल हैं, जबकि कई स्थानीय मजदूर हैं। ये मजदूर निर्माण, परिवहन, कैटरिंग, खनन, साज-सज्जा, उद्योग समेत तमाम कारोबारों से जुड़े हैं, लेकिन इन दिनों इनका टोटा है। यह सिलसिला जनवरी से शुरू हुआ था। बाजार से मजदूर लगभग पूरी तरह गायब हो गए हैं। इससे कारोबारियों के साथ ही आम लोगों के लिए भी मुश्किलें खड़ी हो गई हैं। मजदूर उपलब्ध न होने से तमाम व्यवसाय ठप से हो गए हैं। इससे कारोबार में लगातार गिरावट आ रही है। जानकारों का मानना है कि कुमाऊं में अब तक इससे 50 करोड़ से अधिक का कारोबार प्रभावित हुआ है। सर्वाधिक असर निर्माण क्षेत्र पर पड़ा है। छोटे कारोबारी ज्यादा हलकान हैं। दूसरी ओर मजदूर इन दिनों लोकतंत्र के पर्व में मौज काट रहे हैं। ये विभिन्न राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और निर्दलीय प्रत्याशियों के चुनाव में मशगूल हैं और प्रत्याशियों की गैदरिंग का एक बड़ा आधार बने हुए हैं। इन्हें प्रत्याशियों के जनसंपर्क, चुनावी सभा, दावतों में देखा जा सकता है। कई प्रत्याशियों ने मजदूरों को ठेकेदारों के मार्फत मतदान तक बुक कर लिया है। इससे माह भर कारोबारी गतिविधियों के ठप रहने के आसार बने हुए हैं।

शुक्रवार, 20 जनवरी 2012

'भीम की नगरी‘ में चुनावी ’महाभारत‘


भाजपा ने लिया अपने कैबिनेट मंत्री का टिकट कटाने का जोखिम तो कांग्रेस ने भी ली है मजबूत क्षत्रपों की नाराजगी 
मूलभूत समस्याओं से ग्रस्त है क्षेत्र, नुमाइंदे बाहर रहकर करते हैं  क्षेत्र की नेतागिरी, प्रत्यासियों मैं भी अधिकाँश के बाहर ही हैं ठौर-ठिकाने 
नवीन जोशी, नैनीताल। द्वापर युग के महाबली भीम की नगरी भीमताल में विस चुनाव की महाभारत शुरू हो गयी है। अपार पर्यटन संभावनाओं के इस क्षेत्र में जनता आदिम युग सरीखी समस्याएं झेलने को विवश है। विस चुनाव में 12 प्रत्याशी मैदान में हैं, पर उनमें से क्षेत्र में स्थाई तौर पर रहने वाला प्रत्याशी ढूंढना आसान नहीं है। यह संयोग ही है कि इस बार विस चुनाव में महाभारत की भांति ही नामांकन पत्रों की जांच के दिन यानी 13 जनवरी के बाद से चुनाव तक महाभारत की भांति 18 दिन का ही समय मिला है। बावजूद अभी चुनाव परिणामों पर कुछ भी कहना जल्दबाजी होगा। भाजपा ने कुमाऊं की इस सीट पर मौजूदा विधायक काबीना मंत्री गोविंद सिंह बिष्ट का टिकट काट कर नये चेहरे रामगढ़ के ब्लाक प्रमुख दान सिंह भंडारी को टिकट देने का जोखिम उठाया, जबकि कांग्रेस ने भी कुछ ऐसी ही राह पर चलते हुए पार्टी के दमदार प्रत्याशियों शेर सिंह नौलिया व पुष्कर मेहरा को ठुकराकर ओखलकांडा की ब्लाक प्रमुख के पति राम सिंह कैड़ा पर दांव आजमाया। भीमताल सीट पर 47,007 पुरुष एवं 39,894 महिलाओं सहित कुल 86,901 मतदाता चुनाव के दौरान भावी विधायक चुनने के लिए भाग्य विधाता की भूमिका में हैं। जातिगत आधार पर बात करें तो क्षेत्र में सर्वाधिक 45 हजार क्षत्रिय व 30 हजार ब्राrाण हैं जिनका वोट इस सीट पर निर्णायक हो सकता है। 12 हजार अनुसूचित तथा अन्य वगरे के मतदाता भी प्रभावी भूमिका में हैं। मुद्दों-समस्याओं की बात करें तो ओखलकांडा जनपद का दूरस्थ और समस्याओं से घिरा क्षेत्र है। गर्मियों के दौरान प्रशासन यहां घोड़े-खच्चरों से पेयजल उपलब्ध कराने का प्रयास करता है। मोबाइल के सिग्नल मिलना भी यहां कठिन होता है। ग्रामीण जीपों में किसी तरह लद कर आवागमन करने को मजबूर हैं। पूरे ब्लाक में स्कूलों में शिक्षक व अस्पतालों में चिकित्सक नहीं मिलते। ऐसे में हरीशताल-लोहाखाम ताल जैसे अनछुए पर्यटन स्थलों की अपार संभावनाओं वाले इस क्षेत्र के लोग किसी बड़े सपने को देखने की स्थिति में भी नहीं हैं। 

मंगलवार, 17 जनवरी 2012

कालाढूंगी के चक्रव्यूह में फंस गये भाजपा के "बंशीधर"



चुनाव समीक्षा : कालाढूंगी विस क्षेत्र
भगत के लिए आसान नहीं जीत की राह, घिरे हैं चतुष्कोणीय मुकाबले में

प्रदेश की सर्वाधिक मुश्किल सीटों में है कालाढूंगी, 11 में से छह प्रत्याशी हैं मुकाबले में, 
नवीन जोशीनैनीताल। कालाढूंगी विस सीट को यदि प्रदेश की सर्वाधिक फंसी हुई सीट कहें तो अतिशयोक्ति न होगी। यहां विस चुनाव का बिगुल बजने से कहीं पूर्व दावेदारों का ‘संघषर्’ शुरू हो गया था। खासकर भाजपा- कांग्रेस के दावेदार इस सीट को ‘हॉट केक’ मानकर गटक जाने के ऐसे अतिविास में देखे गये कि मानो उन्हें टिकट मिला और उनका विधायक बनना निश्चित हो। टिकट पाने को सर्वाधिक सिर-फुटव्वल इस सीट पर देखी गई। अब जबकि पार्टियों के प्रत्याशी नामांकन करा चुके हैं, तब यह संघर्ष दिन प्रति दिन बढ़ता जा रहा है। 11 में से छह प्रत्याशी मुकाबले में हैं लेकिन आखिर में भाजपा, कांग्रेस, बसपा और निर्दलीय महेश शर्मा के बीच चतुष्कोणीय मुकाबला सिमट सकता है। ऐसे में इस सीट के प्रमुख भाजपा प्रत्याशी काबीना मंत्री बंशीधर भगत के बारे में कहा जा सकता है शेर अपनी मांद में घिर गया है। कालाढूंगी विस सीट के लिए पहली बार चुनाव हो रहा है। हल्द्वानी तथा पर्यटन नगरी नैनीताल-रामनगर के बीच होने के बावजूद विकास यहां कोसों दूर रहा है। उत्तराखंड बनने के बाद भी हालात में सुधार नहीं हुआ। पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार ने कालाढूंगी को प्रदेश का पहला हाईटेक पालिटेक्निक बनाने तथा वर्तमान सरकार ने रोडवेज बस अड्डा, मिनी स्टेडियम व गैस गोदाम बनाने जैसे ख्वाब दिखाए थे लेकिन पूरे नहीं किए। राज्य बनने और उससे पूर्व से यह सीट नैनीताल सीट का हिस्सा रही है। बीते 21 वर्षो से नैनीताल में शामिल इस सीट पर कांग्रेस नहीं जीत पाई है। 1986 में चुनाव जीते किशन सिंह तड़ागी इस सीट से आखिरी कांग्रेसी विधायक रहे। 91 की रामलहर से लगातार तीन चुनाव भाजपा के वर्तमान काबीना मंत्री बंशीधर भगत यहां से जीते। 2002 में डा. नारायण सिंह जंतवाल उक्रांद के टिकट पर भाजपा से यह सीट झटकने में सफल रहे लेकिन गत 2007 के विस चुनाव में भाजपा के खड़क सिंह बोहरा ने पुन: यह सीट हासिल कर भाजपा का एक बार पुन: नैनीताल से परचम फहराया। अब भगत क्षेत्र से चौथी और जंतवाल दूसरी जीत की कोशिश में फिर मैदान में हैं। इस क्षेत्र की खासियत रही है कि यहां की जनता जीतने वाले प्रत्याशी को वोट देती आई है। यानी जो भी विधायक जीतता है, इस क्षेत्र में उसे बढ़त मिली होती हैं। इसी कारण नैनीताल के वर्तमान विधायक खड़क सिंह बोहरा और पूर्व विधायक डा. नारायण सिंह जंतवाल ने यहां से दावेदारी की थी। नई सीट होने, नैनीताल सीट के सुरक्षित घोषित हो जाने तथा हल्द्वानी सीट के शहर क्षेत्र में ही सीमित हो जाने के कारण भाजपा- कांग्रेस सहित उक्रांद में यहां एक से अधिक दावेदार टिकट हासिल करने को ऐड़ी चोटी का जोर लगा रहे थे। भाजपा से काबीना मंत्री बंशीधर भगत और कांग्रेस से राहुल गांधी के करीबी बताये जा रहे प्रकाश जोशी के मैदान में आने से यह सीट प्रदेश की वीआईपी सीटों में शुमार हो गई है। भगत क्षेत्र में अपने संपकरे, पार्टी के कैडर मतदाताओं तथा पिछले विस चुनाव के अलावा लोस चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी की जीत के बावजूद भाजपा प्रत्याशी को मिली बढ़त तथा स्वयं की लगातार तीन जीतों के आधार पर यहां जीत का दावा कर रहे हैं, लेकिन पार्टी के अन्य दावेदारों क्षेत्रीय विधायक बोहरा व भाजयुमो के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष गजराज बिष्ट की नाराजगी उनकी राह में बाधा बनी हुई है। दोनों दावेदारों ने क्षेत्र से चुनाव प्रचार करने से तौबा कर रखी है, ऐसे में वह भगत को नुकसान कितना पहुंचाएंगे, यह भगत की जीत-हार पर निर्भर करेगा। कांग्रेस से ‘पैराशूट प्रत्याशी’ बताये जा रहे प्रकाश जोशी की ऊर्जा स्वयं को स्थानीय साबित करने में लगी हुई है जबकि समर्थक उन्हें राहुल गांधी का नजदीकी होने का दावा कर क्षेत्र में विकास की गंगा बहा देने का ख्वाब दिखाकर जनता को अपने पक्ष में करने के प्रति आस्त हैं। कांग्रेस के बागी निर्दलीय उम्मीदवार जिला पंचायत अध्यक्ष कमलेश शर्मा के पति महेश शर्मा भगत के ही गृह क्षेत्र सर्वाधिक 65000 की जनसंख्या वाले ‘भाखड़ा वार’ में अच्छा दखल रखते हैं। उन्होंने क्षेत्र में बीते एक-दो वर्षो से अच्छी मेहनत की है, ऐसे में वह कांग्रेस प्रत्याशी के साथ ही भगत को भी नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसी भाखड़ा वार क्षेत्र निवासी जिपं सदस्य भूपेंद्र सिंह उर्फ भाई जी भी निर्दलीय उम्मीदवार हैं। उनकी भी खासकर युवा वर्ग में काफी पैठ बताई जा रही है। इस क्षेत्र में रक्षा मोर्चा के सुरेंद्र निगल्टिया, निर्दलीय कांग्रेस से जुड़े वीर सिंह भी मैदान में हैं। दूसरी ओर 45000 की आबादी वाले ‘भाखड़ा पार’ क्षेत्र जिसमें कालाढूंगी नगर भी शामिल है, बाहरी-भीतरी का मुद्दा अधिक दिखाई दे रहा है। यहां बसपा प्रत्याशी दीवान सिंह बिष्ट सबसे पहले पार्टी प्रत्याशी घोषित होने, अनुसूचित वर्ग के करीब 20 हजार तथा क्षत्रिय समुदाय के सर्वाधिक 51 हजार से अधिक वोट होने व स्वयं अकेले दमदार क्षत्रिय प्रत्याशी होने के आधार के साथ मजबूत दिखते हैं। क्षेत्र में साढ़े तीन हजार मुस्लिम, छह हजार पंजाबी, साढ़े चार हजार वैश्य के अलावा 15 हजार ब्राह्मण भी प्रभावी भूमिका में हैं। कांग्रेस, भाजपा, उक्रांद प्रत्याशी और निर्दलीय महेश शर्मा आदि के भी ब्राrाण होने के कारण वह किसी एक के पक्ष में मतदान करेंगे कहा नहीं जा सकता। निर्दलीय जनार्दन पंत, तृणमूल कांग्रेस के फिदाउर्हमान, सपा के उमेश शर्मा भी मैदान में हैं।
मूलतः इस लिंक को क्लिक करके देखें

मंगलवार, 10 जनवरी 2012

30 को शर्तिया होगी बर्फबारी: कोटलिया

ऊंची चोटियों सहित बागेश्वर की घाटियों तक होगी बर्फबारी
नवीन जोशी नैनीताल। मौसम वैज्ञानिक कुमाऊं विवि के भू-विज्ञान विभाग में यूजीसी के प्रोफेसर बीएस कोटलिया का दावा है कि उत्तराखंड में विस चुनाव की तिथि (30 जनवरी) को भारी बर्फबारी होगी। इस दिन न केवल ऊंची चोटियों वरन बागेश्वर जैसी घाटी के स्थान तक बर्फ गिर सकती है। कोटलिया 30 को चुनाव हो पाने के प्रति भी आशंकित हैं। इसके साथ ही उनका दावा है कि जनवरी के मुकाबले फरवरी में अधिक सर्दी व बर्फबारी होने वाली है। उनका दावा है कि इस वर्ष उत्तराखंड में ठंड का 50 वर्षो का रिकार्ड टूट चुका है और ठंड से अभी निजात नहीं मिलेगी। 
प्रदेश के साथ ही देश-विदेश में गुफाओं में पायी जाने वाली शिवलिंग के आकार की चट्टानों के जरिये हजारों वर्ष पूर्व के इतिहास पर अध्ययन करने वाले प्रो. कोटलिया ने ‘राष्ट्रीय सहारा’ से बातचीत में यह दावे किये। इससे पूर्व वह वर्ष 2007 के सर्वाधिक गर्म वर्ष होने, 2011 में 50 वर्ष की सर्दी के रिकार्ड टूटने जैसी मौसम संबंधी भविष्यवाणियां भी कर चुके हैं। प्रदेश में कई हजारों वर्ष पुरानी गुफाओं को खोजने का श्रेय भी उन्हें जाता है। इधर उन्होंने ताजा दावा उत्तराखंड में होने जा रहे विस चुनाव को लेकर किया है। उन्होंने आशंका जताई है कि तय तिथि पर चुनाव नहीं हो पाएंगे। उन्होंने दावा किया कि 30 जनवरी को प्रदेश के नैनीताल, मुक्तेश्वर, कपकोट, गोपेश्वर, जोशीमठ जैसे ऊंचाई वाले सभी क्षेत्रों में बर्फबारी होगी जबकि बागेश्वर जैसी घाटी तक भी बर्फबारी हो सकती है। उन्होंने बताया कि उनके पास मुक्तेश्वर के 130 वर्षो के मौसम संबंधी रिकार्ड उपलब्ध हैं जो इस वर्ष टूट चुके हैं। 
11 वर्ष में सौर चक्र से भी प्रभावित होता है मौसम  
प्रो. कोटलिया के अनुसार धरती पर प्रकाश के साथ ऊष्मा यानी गर्मी के सबसे बड़े श्रोत सूर्य की सक्रियता का चक्र 11 वर्ष का होता है और यह सक्रियता पृथ्वी पर सर्दी-गर्मी को बढ़ाने वाली भी साबित होती है। इस आधार पर भी वर्ष 2003-04 में पड़ी सर्दी की 11 वर्ष बाद 2011-12 की सर्दियों में पुनरावृत्ति होने की वैज्ञानिकों को आशंका है। कोटलिया के अनुसार उनके द्वारा किये गये हजारों वर्ष के मौसम के अध्ययन में 11 वर्षीय मौसमी चक्र की पुष्टि हुई है। 
ला-निना का भी है प्रभाव 
इस वर्ष हो रही भारी बर्फबारी व कड़ाके की ठंड प्रशांत महासागर से उठने वाली ला-निना नाम की सर्द हवाएं भी बताई जा रही हैं। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार प्रशांत से उठने वाली गर्म हवाएं-अल निनो व सर्द हवाएं-ला निना दुनिया भर के मौसम को प्रभावित करती हैं। दो से सात वर्षो में इसका प्रभाव बढ़ता है।
मूलतः यह समाचार इस लिंक को क्लिक कर राष्ट्रीय सहारा के 11 जनवरी 2012 के अंक के प्रथम पृष्ठ पर देखा जा सकता है 

शुक्रवार, 6 जनवरी 2012

नैनीताल में रोचक रहेगा कांग्रेस का ‘तीन देवियों’ पर दांव


नवीन जोशी, नैनीताल। कांग्रेस ने विधानसभा के लिए जनपद की छह में से तीन सीटों पर महिलाओं को टिकट दिया है। नैनीताल सीट पर पूर्व पालिकाध्यक्ष सरिता आर्या, हल्द्वानी सीट पर पूर्व काबीना मंत्री डा. इंदिरा हृदयेश तथा रामनगर से पूर्व विधायक व सांसद सतपाल महाराज की पत्नी अमृता रावत को मैदान में उतारा है। अब देखना यह है कि ये ‘तीन देवियां’ कांग्रेस की नैया किस तरह पार लगाती हैं।  
हालांकि कांग्रेस ने नैनीताल जनपद की छः में से आधी यानी तीन सीटों पर जिस तरह "आधी दुनियां" का प्रतिनिधित्व करने वाली महिलाओं  को टिकट दिया है, उससे उसका महिलाओं पर भरोसा जताना कम ही दिखाई देता हैजिले में केवल हल्द्वानी से डा. हृदयेश को टिकट मिलना तय था, वह पार्टी तथा कार्यकर्ताओं की स्वावाविक पसंद थीं। लेकिन मुख्यालय की नैनीताल सीट पर कांग्रेस अध्यक्ष यशपाल आर्य की अनिच्छा तथा अपने पुत्र संजीव आर्य को टिकट न दिला पाने के कारण सरिता पूर्व पालिकाध्यक्ष होने के नाते टिकट पाने में सफल रहीं। टिकट वितरण में अहम भूमिका निभाने वाले केंद्रीय मंत्री हरीश रावत की पसंदगी और महिला मोर्चा प्रदेश अध्यक्ष सरोजनी केंतुरा द्वारा नाम प्रस्तावित किये जाने की वजह से उनको यह ईनाम मिला। अमृता रावत को रामनगर में भारी विरोध तथा पैराशूट प्रत्याशी का तमगा होने के बावजूद गढ़वाल सांसद सतपाल महाराज की पत्नी होने के नाते टिकट मिल गया है। ऐसे में यह दिलचस्प होगा कि जनपद में तीन देवियां कांग्रेस की नैया को कैसे पार लगाती हैं।
पालिका व जिला पंचायत के स्तर के हो गए विधान सभा चुनाव 
नैनीताल। नैनीताल में विधानसभा चुनाव नगर पालिका व जिला पंचायत चुनाव की याद दिला सकता है। यहां भाजपा एवं कांग्रेस प्रत्याशी के बीच जिला पंचायत चुनाव की पुरानी प्रतिद्वंद्विता देखने को मिलेगी। कांग्रेस, बसपा एवं सपा प्रत्याशी भी पालिका चुनावों के दिनों की याद दिलाएंगे। भाजपा प्रत्याशी हेम आर्या की पत्नी नीमा आर्या एवं कांग्रेस प्रत्याशी सरिता आर्या वर्ष 2008 के जिपं चुनावों में मेहरागांव सीट से आमने-सामने थे। इसमें नीमा विजयी रहीं। वहीं सरिता आर्या वर्ष 2003 में हुऐ नगर निकाय चुनाव जीतकर नैनीताल पालिका अध्यक्ष बनी, जबकि उनसे पूर्व बसपा प्रत्याशी संजय कुमार ‘संजू’ वर्ष 1998 से नैनीताल पालिका अध्यक्ष रहे। इसी दौरान सपा प्रत्याशी देवानंद सभासद रहे थे।


रविवार, 1 जनवरी 2012

क्या 'दशरथ' से मिला बनवास 21 वर्ष बाद तोड़ पायेगी कांग्रेस

1986 के बाद से एक अदद जीत को तरसता रहा है 'हांथ'
संभवतया यही कारण यशपाल को रोकता हो नैनीताल से चुनाव लड़ने से  पार्टी के बुजुर्ग कार्यकर्ता मानते हैं यशपाल ही तोड़ सकते हैं यह क्रम 
नवीन जोशी, नैनीताल। राजा दशरथ ने राम को  १२ वर्ष के बनवास पर भेजा था, लेकिन यहाँ नैनीताल में एक दशरथ ने कांग्रेस पार्टी को बनवास पर भेजा था, जिस से वह 21  वर्ष बाद भी वापस नहीं लौट पा रही है 1991 की राम लहर में रामलीला में 'दशरथ' का चरित्र निभाने वाले भाजपा के बंशीधर भगत ने कांग्रेस को जिस बनवास पर भेजा था, कांग्रेस के लिए उस से अभी भी वापस लौटना आसान नहीं लगता। शायद यही कारण हो कि अपनी परंपरागत सीट मुक्तेश्वर का काफी हिस्सा होने के बावजूद कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष यशपाल आर्य यहाँ से चुनाव लड़ने के अधिक इच्छुक नहीं दिख रहे, जबकि पार्टी के बुजुर्ग कार्यकर्ताओं का मानना है कि कांग्रेस की बनवास से वापसी इस बार कोई करा सकता है तो वह केवल यशपाल ही हो सकते हैं।
नैनीताल कुमाऊं मंडल की उन गिनी-चुनी सीटों में होगी, जिन्हें कांग्रेस पार्टी की परंपरागत सीट कहने से हर किसी को गुरेज होगा। अतीत से बात शुरू करें तो यूपी के दौर में लंबी-चौड़ी इस सीट पर वर्ष 1977 में राम दत्त जोशी जनता दल के टिकट पर विधायक रहे। अगले 82 के चुनावों में शिव नारायण नेगी ने यह सीट कांग्रेस की झोली में डालकर नफा-नुकसान बराबर करने की कोशिश की। 86 में साफ-स्वच्छ छवि के किशन सिंह तड़ागी ने कांग्रेस के लिये सीट बरकरार रखी, परंतु 91 की रामलर में भाजपा के ‘दशरथ’ बंशीधर गत ने कांग्रेस के शेर सिं नौलिया को पटखनी दी, और आगे अगले तीन चुनावों में वह यहाँ से जीत की हैट्रिक बनाते रहे। राज्य बनने के बाद वह इस सीट को छोड़कर हल्द्वानी चले गये, परिणामस्वरूप अपनी साफ-स्वच्छ छवि के बल पर डा. नारायण सिंह जंतवाल उक्रांद के टिकट पर भाजपा से यह सीट झटकने में सफल रहे, और कोंग्रेस का बनवास जारी रहा। गत 2007 के विस चुनावों में खड़क सिंह बोहरा ने पुनः यह सीट हांसिल कर भाजपा का एक बार पुनः नैनीताल से परचम फरा दिया। इसके साथ ही नैनीताल के लिये हांलिया वर्षों में यह माना जाने लगा है कि बुद्धिजीवियों के शहर के जाने वाले नैनीताल से चुनाव लड़ने के लिये पार्टी तथा प्रत्याशी दोनों की साफ-स्वच्छ छवि अधिक मायने रखती है। इस बात को भाजपा-कांग्रेस, उक्रांद सहित सभी पार्टियों के नेता भी स्वीकार करते हैं।  लेकिन जहाँ तक कांग्रेस के लिये 21 वर्ष के बनवास को तोड़ने का सवाल है, नगर के वरिष्ठतम कांग्रेसी किसन लाल साह ‘कोनी’, मोहन कांडपाल सहित अधिकांश कांग्रेसियों का भी मानना है कि यह मिथक तोड़ने में कांग्रेस केवल एक ही शर्त पर सफल हो सकती है, यदि यशपाल यहाँ से चुनाव लड़ें। अब पार्टी प्रदेश अध्यक्ष यशपाल पर है कि वह स्वयं फ्रंट पर आकर बल्लेबाजी कर अपनी टीम को लीड करते हैं या नहीं।